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Tuesday, April 21, 2015

सफलता के बीज मंत्र (Pravachan : Just for Motivation)

महात्मा नित्यानंद ने अपने शिष्यों को बाँस से बनी बाल्टियां पकड़ाकर कहा : जाओ, इन बाल्टियों में नदी से जल भर लाओ। आश्रम में सफाई करनी है। नित्यानंद की इस विचित्र आज्ञा को सुनकर सभी शिष्य आश्चर्यचकित रह गए। भला बाँस से बनी बाल्टियों में जल कैसे लाया जा सकता था! फिर भी, सभी शिष्यों ने बाल्टियां उठाईं और जल लेने नदी तट की ओर चल दिए। वे जब बाल्टियां भरते, तो सारा जल निकल जाता था। 

अंतत: निराश होकर एक को छोड़कर सभी शिष्य लौट आए और महात्मा नित्यानंद से अपनी दुविधा बता दी। लेकिन, एक शिष्य बराबर जल भरता रहा। जल रिस जाता तो पुन: भरने लगता। शाम होने तक वह इसी प्रकार श्रम करता रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि बाँस की शलाकाएं फूल गईं और छिद्र बंद हो गए। तब वह बड़ा प्रसन्न हुआ और उस बाल्टी में जल भरकर गुरुजी के पास पहुँचा। जल से भरी बाल्टी लाते देख महात्मा नित्यानंद ने उसे शाबाशी दी और अन्य शिष्यों को संबोधित करते हुए कहा,..

“विवेक, धैर्य, निष्ठा व सतत् परिश्रम से दुर्गम कार्य को भी सुगम बनाया जा सकता है।
सफलता कोई ऐसी वस्तु नहीं है कि आपने माँगा या चाहा और आपको मिल गई। इसे तुंरत प्रस्तुत नहीं किया जा सकता, इसमें लगातार परिश्रम करना होगा। एक कठिन परिश्रमी व्यक्ति ही सफलता पाता है, और अपने कारण पाता है, दूसरों के कारण नहीं। इसीलिए सफल व्यक्ति याद किए जाते हैं।


किसी भी कार्य को पूरी तरह करने के लिए कुशलता के साथ कार्य की निरन्तरता भी आवश्यक होती है। ऐसा नहीं करना चाहिए कि आज किया, फ़िर कुछ दिन आराम करें, फ़िर करें। ऐसा करने से कार्य तो रुकता ही है, वह ठीक तरह से होता भी नहीं क्योंकि एकाग्रता भंग होती है। मन उतना नहीं लगता जितनी उस कार्य को जरुरत होती है, और सफलता भी रुक जाती है, आपके साथी आपसे आगे हो जाते हैं। इसलिए अपने काम को एक रफ़्तार देनी होगी तभी सफलता प्राप्त होगी, आवश्यक समय और प्रयास निरंतर देना होगा।

श्री कृष्ण ने गीता में कहा है- संशयात्मा विनश्यति! अर्थात- जिसमें संशय हो उसका विकास नही होता।

किसी काम को करने के पहले अगर मन में दो तरह के विचार रहते हैं कि करें या न करें, इसे करने से लाभ होगा या नहीं, मन की यह स्थिति असफलता की तरफ़ ले जाती है। काम के पूरा होने से पहले फल की कल्पना करना और कामना करना ग़लत है, ऐसा करने से कर्म करने की कुशलता घट जाती है क्योंकि मन संदेह के घेरे में रहता है। पूरी तरह मन को एकाग्र करके कर्म करने से काम तो कुशलता से होता ही है फल भी अवश्य अच्छा आता है।

याद रखिये जीवन में अपना विवेक ही अपना सच्चा साथी है। अपनी बुद्धि श्रेष्ठ हो, इसका प्रयत्न हमेशा करना चाहिए क्योंकि बुद्धि के द्वारा सब कुछ जीता जा सकता है और सब कुछ पाया जा सकता है।”

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